जहां आपसी विवाद ने एक गरीब परिवार की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर दिया। यह घटना 21 मार्च की रात करीब 10 बजे की बताई जा रही है, जब सोमिन पासवान अपने परिवार के साथ घर पर मौजूद थे। अचानक हुए इस हमले ने पूरे परिवार को दहशत में डाल दिया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बबलू पासवान और राजबली पासवान के बीच पहले से चल रहे किसी पुराने विवाद को लेकर झगड़ा शुरू हुआ। देखते ही देखते यह विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों पक्षों ने आपा खो दिया और पास में रहने वाले सोमिन पासवान के घर को निशाना बना लिया। बताया जा रहा है कि गुस्से में आकर आरोपियों ने घर में घुसकर जमकर तोड़फोड़ की।
हमले के दौरान घर की छत को क्षतिग्रस्त कर दिया गया और अंदर रखे घरेलू सामान को भी तोड़ दिया गया। पूरे घर का सामान बिखेर दिया गया, जिससे घर पूरी तरह अस्त व्यस्त हो गया। इस घटना में सोमिन पासवान को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है।
सोमिन पासवान पेशे से एक दिहाड़ी मजदूर हैं, जो रोज कमाकर अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं। उनके परिवार में पांच सदस्य हैं, जिनमें तीन छोटे छोटे बच्चे भी शामिल हैं। पहले से ही आर्थिक तंगी झेल रहे इस परिवार के सामने अब रहने की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है। टूटे हुए घर में रहने को मजबूर यह परिवार बेहद भयभीत और परेशान है।
घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल है। स्थानीय लोगों में भी इस घटना को लेकर काफी आक्रोश देखने को मिल रहा है। लोगों का कहना है कि दो व्यक्तियों के आपसी विवाद में एक निर्दोष और गरीब परिवार को निशाना बनाना बेहद शर्मनाक और निंदनीय है।
पीड़ित परिवार ने प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई है और मुआवजे की मांग की है, ताकि वे अपने घर को फिर से बना सकें और सामान्य जीवन जी सकें। वहीं इस घटना ने क्षेत्र में कानून व्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोग दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हो सकें।




मंजू देवी के अनुसार वर्ष 2018 में आरोपियों ने उनके परिवार के साथ बुरी तरह मारपीट की थी। उस दौरान उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया और मारपीट के दौरान उनके हाथ को दांत से काट लिया गया, जिससे उनकी एक उंगली गंभीर रूप से घायल हो गई। जब उनके पति अर्जुन महतो बीच-बचाव करने पहुंचे तो आरोपियों ने उनकी आंखों में मसाला झोंक दिया, जिससे उन्हें भी काफी चोट आई। इस घटना के बाद पीड़िता ने आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था, जो अभी भी न्यायालय में विचाराधीन बताया जा रहा है।
लिखवाई और उसे थाने में जमा करा दिया। लेकिन उस तहरीर की कोई प्रति उन्हें नहीं दी गई। जब कुछ समय बाद उन्होंने तहरीर की छाया प्रति लेने की कोशिश की, तो उन्हें बताया गया कि मामला कोर्ट में भेज दिया गया है। प्रार्थी ने 26 नवंबर 2025 को थाना जाकर जानकारी लेने की कोशिश की, लेकिन कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। इसके बाद उन्होंने 28 नवंबर 2025 को रजिस्ट्री के माध्यम से थाना अध्यक्ष को पत्र भी भेजा, लेकिन उसका भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इतना ही नहीं, 4 दिसंबर 2025 को दोबारा थाना जाने पर भी उन्हें तहरीर की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई। अब वे यह भी नहीं जान पा रहे हैं कि उनकी शिकायत किस न्यायालय में भेजी गई है, जिससे वे वहां जाकर उसकी प्रति प्राप्त कर सकें। पीड़ित पिता ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से गुहार लगाई है कि उन्हें यह जानकारी उपलब्ध कराई जाए कि उनकी तहरीर किस कोर्ट में भेजी गई है, ताकि वे उसकी छाया प्रति प्राप्त कर सकें और आगे की कार्रवाई कर सकें। इस पूरे मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर जहां एक व्यक्ति अपने परिवार के चार सदस्यों को खोकर पहले ही गहरे सदमे में है, वहीं दूसरी ओर उसे न्यायिक प्रक्रिया की बुनियादी जानकारी और दस्तावेज पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और पीड़ित को कब तक राहत मिलती है।
सहबीर ने बताया कि उसने 1 जनवरी 2026 को थाना चांदपुर में शिकायत दी, लेकिन वहां से उसे जलीलपुर चौकी भेज दिया गया। चौकी में प्रार्थना पत्र जमा होने के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।