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CDRI कर्मचारी पर रिश्तेदारी का भरोसा तोड़ने का आरोप, दादी के शेयर हड़पने का दावा, अकेली महिला ने लगाई न्याय की गुहार

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लखनऊ | विशेष रिपोर्ट

राजधानी लखनऊ से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां सी.डी.आर.आई. (Central Drug Research Institute) में *कार्यरत एक कर्मचारी पर अपनी ही बहन (रुचि सक्सेना) के पिता का हक* हड़पने और वर्षों पुरानी पारिवारिक संपत्ति को गुपचुप तरीके से बेच देने के गंभीर आरोप लगे हैं। पीड़िता का कहना है कि रिश्तों की आड़ में उसके साथ आर्थिक धोखाधड़ी की गई और आज वह अकेली होकर न्याय की चौखट पर खड़ी है।

1980 के दशक के शेयर, 2001 में दादी का निधन

राजाजीपुरम, सेक्टर-13 सी-ब्लॉक निवासी रूचि सक्सेना, पुत्री स्वर्गीय श्रवण कुमार सक्सेना, ने बताया कि उनकी दादी लल्ली देवी ने 1980 के दशक में कुछ फिजिकल शेयर खरीदे थे। इन शेयरों की निगरानी परिवार के ही सदस्य संजीव सक्सेना, पुत्र स्वर्गीय संतोष कुमार सक्सेना, के पास थी, जो वर्तमान में CDRI लखनऊ के एनीमल हाउस विभाग में कर्मचारी हैं।

वर्ष 2001 में लल्ली देवी के निधन के बाद, रूचि की मां और दो भाई (जो अब जीवित नहीं हैं) ने जब अपने वैधानिक हिस्से की मांग की, तो संजीव सक्सेना ने यह कहकर टाल दिया कि “जब शेयर बिकेंगे, तब बंटवारा होगा।”
रिश्तों से दूरी और गुपचुप बिक्री
पीड़िता का आरोप है कि इसके बाद संजीव सक्सेना ने परिवार से बातचीत, मिलना-जुलना और फोन उठाना तक बंद कर दिया। कुछ समय बाद यह सामने आया कि शेयरों को गुप्त रूप से बेच दिया गया, लेकिन उनके पिता या परिवार को कोई हिस्सा नहीं दिया गया, जबकि उस पर उनका कानूनी अधिकार था।

आज अकेली है रूचि, पति से तलाक, पूरा परिवार खत्म
रूचि सक्सेना ने बताया कि उनके पिता पहले ही गुजर चुके थे, अब मां और दोनों भाई भी नहीं रहे। उनकी शादी प्रेम विवाह थी, लेकिन 3–4 साल बाद तलाक हो गया। आज वह अपने माता-पिता के घर में अकेली जीवन गुजार रही हैं। उनका कहना है कि इसी अकेलेपन का फायदा उठाकर संजीव सक्सेना अब साफ कह रहे हैं कि “मेरे पास कोई शेयर नहीं है, मैं इस विषय पर बात नहीं करना चाहता।”
नंबर ब्लॉक, पता बदला, जवाबदेही से बचने का आरोप

पीड़िता का आरोप है कि संजीव सक्सेना ने जानबूझकर अपना निवास स्थान बदल लिया, ताकि वह उनसे संपर्क न कर सके। साथ ही उनका मोबाइल नंबर और व्हाट्सएप हर जगह से ब्लॉक कर दिया गया है। जब शेयरों की बिक्री से जुड़े कागजात, एग्रीमेंट या हिसाब-किताब मांगा गया, तो वह भी दिखाने से मना कर दिया गया।
कभी कहा गया कि शेयर स्वर्गीय सुशील सक्सेना (जिनका 2011 में निधन हो गया) को दे दिए गए, तो कभी किसी और पर जिम्मेदारी डाल दी गई।
प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग
रूचि सक्सेना ने CDRI के सूचना अधिकारी से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि शेयर कब, कैसे और किसके माध्यम से बेचे गए। उनका कहना है कि वह बेसहारा हैं, लेकिन अपने पिता के हक के लिए आखिरी दम तक लड़ेंगी।

अब सवाल यह उठता है कि
क्या एक सरकारी संस्थान का कर्मचारी पारिवारिक भरोसे की आड़ में वर्षों तक संपत्ति हड़प सकता है?
और क्या एक अकेली महिला को उसके वैधानिक अधिकार मिल पाएंगे?

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