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दिव्यांग पति की पत्नी दर-दर भटकने को मजबूर: दबंगों पर मकान कब्जाने का आरोप, शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं

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अम्बेडकरनगर। जिले के बसखारी थाना क्षेत्र के शाहपुर-महमूदपुर गांव से एक बेहद संवेदनशील और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक महिला अपने ही मकान के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। पीड़िता संगीता सिंह ने आरोप लगाया है कि विपक्षी पक्ष दबंगई के बल पर उनके घर पर अवैध कब्जा जमाए हुए हैं और उन्हें तथा उनके छोटे-छोटे बच्चों को घर में घुसने तक नहीं दिया जा रहा।

पीड़िता के अनुसार, उनके पति ध्रुवनारायन सिंह लगभग 60 प्रतिशत दिव्यांग हैं और उनके देवर भी शारीरिक रूप से अक्षम हैं, जिसके चलते परिवार पूरी तरह से असहाय स्थिति में है। संगीता सिंह ने बताया कि उनके ससुर का निधन वर्ष 1992 में हो गया था और परिवार के पास रहने के लिए कोई पक्का घर नहीं था। ऐसे में वर्ष 2002 में उनके पति ने अपनी जमीन बेचकर यह मकान बनवाया था, जो पूरी तरह उनका है।

संगीता सिंह का आरोप है कि रेनू मिश्रा (पत्नी स्व. अशोक मिश्रा) और रोहित मिश्रा (पुत्र अशोक मिश्रा) जबरन उनके घर में कब्जा कर रह रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि रेनू मिश्रा की शादी हो चुकी है, इसके बावजूद वह लॉकडाउन के समय से ही उनके घर में रहकर कब्जा जमाए हुए हैं और अब घर खाली करने से इनकार कर रही हैं। इतना ही नहीं, पीड़िता के पति पर 307 जैसे गंभीर मुकदमे में भी फंसाने का आरोप लगाया गया है, जिससे परिवार और अधिक भय और दबाव में है।

पीड़िता ने बताया कि उन्होंने इस मामले में कई बार उपजिलाधिकारी आलापुर को उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा 45 और 46 के तहत प्रार्थना पत्र दिया, साथ ही मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर भी तीन बार शिकायत दर्ज कराई। शिकायत संदर्भ संख्या 15178260001262 होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। पीड़िता का कहना है कि अधिकारियों द्वारा केवल आश्वासन दिया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई कदम नहीं उठाया जा रहा।

घर से बेदखल होने के कारण संगीता सिंह अपने दो छोटे बच्चों के साथ बेहद दयनीय स्थिति में जीवन यापन कर रही हैं। बच्चों की पढ़ाई भी बाधित हो रही है और परिवार मानसिक, सामाजिक व आर्थिक संकट से गुजर रहा है। पीड़िता ने मुख्यमंत्री से गुहार लगाते हुए कहा है कि उन्हें उनका मकान वापस दिलाया जाए ताकि वह अपने बच्चों के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस तरह के मामलों में भी प्रशासन निष्क्रिय बना रहेगा, तो आम लोगों का कानून व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा। फिलहाल पीड़ित परिवार न्याय की आस लगाए बैठा है और प्रशासनिक हस्तक्षेप का इंतजार कर रहा है।

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