खगड़िया/दिल्ली। उषा देवी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। पहले जहां परिजनों ने इसे हत्या बताते हुए पति और उसके कथित संबंधों पर सवाल उठाए थे, वहीं अब पुलिस की कार्यप्रणाली और स्थानीय स्तर पर मिल रही धमकियों ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
परिजनों का आरोप है कि घटना के बाद जब वे थाने में लिखित शिकायत देने पहुंचे, तो पुलिस ने शिकायत को सही तरीके से दर्ज नहीं किया और न ही उसकी कोई रसीद या प्राप्ति दी। इतना ही नहीं, जब परिवार के लोग शिकायत की कॉपी का फोटो लेने लगे तो पुलिसकर्मियों ने उन्हें ऐसा करने से भी रोक दिया। इस व्यवहार से परिवार में आक्रोश और भय का माहौल है।
मामले में नया मोड़ तब आया जब परिजनों ने आरोप लगाया कि उषा देवी के पति और उनके परिवार की ओर से लगातार धमकियां दी जा रही हैं। परिजनों के अनुसार, संजय दास, सुरेंद्र दास और पांडव दास सहित अन्य लोग उषा के भाई को फोन कर धमका रहे हैं कि यदि शिकायत वापस नहीं ली गई तो जान से मार दिया जाएगा। कुछ लोग मौके पर पहुंचकर सीधे दबाव बना रहे हैं, जबकि अन्य फोन कॉल के जरिए धमकी दे रहे हैं।
परिवार का कहना है कि इस समय उषा का भाई वहां अकेले हैं और लगातार भय के साये में जी रहे हैं। उनके अनुसार, अभी सभी परिजन वहां नहीं पहुंच पाए हैं, जिसका फायदा उठाकर आरोपित पक्ष दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।
मृतका के रिश्तेदारों ने पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पुलिस न केवल शिकायत दर्ज करने में टालमटोल कर रही है, बल्कि पूरे मामले को दबाने की कोशिश भी की जा रही है। ऐसे में उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद कमजोर होती जा रही है।
परिजनों का कहना है कि उषा देवी पिछले कई वर्षों से घरेलू कलह, मारपीट और पति के कथित अवैध संबंधों के कारण मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान थीं। इसलिए उनकी अचानक हुई मौत को आत्महत्या मानना संदेह के घेरे में है और इसकी निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है।
परिवार ने प्रशासन और उच्च अधिकारियों से मांग की है कि मामले में तत्काल हस्तक्षेप किया जाए, शिकायत को विधिवत दर्ज कर उसकी रसीद दी जाए और पीड़ित पक्ष की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि स्थानीय स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई, तो वे उच्च स्तर पर न्याय की गुहार लगाएंगे।
यह मामला अब केवल एक संदिग्ध मौत का नहीं रह गया है, बल्कि इसमें पुलिस की पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून-व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
