Wednesday, March 11, 2026
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अंधेरे में जिंदगी काट रहा भीलवाड़ा का गोपाल: अनाथ बीपीएल कार्डधारी से छीना मीटर, पांच साल से बंद राशन, सिस्टम बना तमाशबीन

भीलवाड़ा (राजस्थान)। शाहपुरा तहसील के प्रतापपुर गांव में रहने वाले गोपाल की जिंदगी आज प्रशासनिक लापरवाही और सामाजिक संवेदनहीनता की जीती-जागती तस्वीर बन चुकी है। अकेले रहने वाले गोपाल न सिर्फ गरीब और अनाथ हैं, बल्कि बीपीएल सूची में नाम होने के बावजूद बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। हालात इतने बदतर हैं कि अब उन्हें अंधेरे में जीवन गुजारने को मजबूर होना पड़ रहा है।

गोपाल के घर में पहले सिर्फ एक ही लाइट जलती थी, लेकिन उसका भी हर महीने करीब 1300 रुपये का बिजली बिल आ रहा था। गरीब आदमी के लिए यह रकम किसी सजा से कम नहीं थी। इसी बीच 26 मार्च 2024 को किसी अज्ञात व्यक्ति ने उनका बिजली मीटर ही उखाड़ कर ले गया। इसके बाद से उनके घर में बिजली पूरी तरह बंद है। शिकायत के बावजूद आज तक न मीटर वापस लगा और न ही बिजली बहाल हुई।

गोपाल ने इस मामले की शिकायत 181 हेल्पलाइन पर भी की, लेकिन वहां से भी सिर्फ आश्वासन मिला, कोई कार्रवाई नहीं हुई। बिजली विभाग, पंचायत और अन्य दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते गोपाल थक चुके हैं, लेकिन उनकी सुनवाई कहीं नहीं हो रही है।

रहने के हालात भी किसी आपदा से कम नहीं हैं। गोपाल का घर कच्चा है। बारिश के दिनों में गांव वालों द्वारा छोड़ा गया गंदा पानी उनके घर के सामने भर जाता है, जिससे चारों तरफ कीचड़ और बदबू फैल जाती है। घर के बाहर बनी नालियां पूरी तरह भरी हुई हैं। मच्छरों का प्रकोप लगातार बना रहता है, जिससे बीमारी का खतरा बढ़ गया है। बावजूद इसके सफाई के लिए आज तक कोई कर्मचारी नहीं पहुंचा।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि गोपाल को पिछले पांच वर्षों से सरकारी गेहूं नहीं मिल रहा है, जबकि पहले उन्हें नियमित राशन मिलता था। बीपीएल कार्डधारी होने के बावजूद उनका नाम राशन वितरण से बाहर कर दिया गया है। कई बार आवेदन देने के बाद भी कोई समाधान नहीं निकला।

गोपाल बताते हैं कि गांव में लोग उनकी मदद करने की बजाय उनका मजाक उड़ाते हैं। अकेलेपन, गरीबी और उपेक्षा के बीच वे खुद को पूरी तरह असहाय महसूस कर रहे हैं। यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पोल खोलता है, जहां कागजों में योजनाएं चल रही हैं और जमीनी हकीकत में गरीब अंधेरे, भूख और गंदगी में जीने को मजबूर है।

अब सवाल यह है कि प्रशासन कब गोपाल की सुध लेगा और कब उसे उसका हक मिलेगा।

 

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