राजस्थान के राजसमन्द जिले में चारागाह भूमि पर कथित पट्टा घोटाले ने प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। रेलमगरा उपखण्ड की ग्राम पंचायत पनोतिया में आराजी नम्बर 315, जो राजस्व अभिलेखों में चारागाह और खेल मैदान के रूप में दर्ज है, उस पर वर्ष 2014 से 2024 के बीच आवासीय पट्टे जारी किए जाने का मामला अब जिला मुख्यालय तक पहुंच गया है। शिकायत के बाद कलेक्ट्रेट स्तर पर सतर्कता जांच के आदेश जारी होने से हड़कंप मच गया है।
मामला तब गरमाया जब जगपुरा निवासी मुन्ना शाह ने जिला प्रशासन को परिवाद सौंपकर आरोप लगाया कि ग्राम पंचायत पनोतिया ने चारागाह भूमि को आबादी भूमि दर्शाकर लगभग 40 आवासीय पट्टे जारी कर दिए। आरोप है कि कई पट्टे पुश्तैनी आधार पर दिए गए, जबकि कुछ मामलों में गरीब और कम आय वर्ग के नाम पर निःशुल्क पट्टे दिखाकर सार्वजनिक भूमि का आवंटन किया गया। शिकायत में इसे सरकारी भूमि के दुरुपयोग और राजस्व हानि का मामला बताया गया है।
प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए कलेक्ट्रेट राजसमन्द के सतर्कता अनुभाग ने 6 नवंबर 2025 को उपखण्ड अधिकारी रेलमगरा को सात दिवस में तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि यदि चारागाह भूमि पर नियम विरुद्ध पट्टे जारी पाए जाते हैं तो संबंधित पक्षों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए और अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन पट्टों की बात की जा रही है, उन पर स्थायी निर्माण भी हो चुका है। ग्रामीणों के अनुसार कई पट्टाधारकों ने पक्के मकान बनाकर निवास शुरू कर दिया है। यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो यह न केवल राजस्व नियमों का उल्लंघन होगा बल्कि ग्राम की सामुदायिक संपत्ति पर स्थायी अतिक्रमण का गंभीर मामला बनेगा। इससे भविष्य में पशुपालन और खेलकूद गतिविधियों के लिए भूमि का अभाव उत्पन्न होने की आशंका है।
शिकायतकर्ता मुन्ना शाह ने पंचायत स्तर से लेकर जिला स्तर तक के अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि पंचायत समिति रेलमगरा के विकास अधिकारी मामराज मीणा, द्वितीय विकास अधिकारी गिरिराज खंगाल और जिला परिषद राजसमन्द के सीईओ बृज मोहन बेरवा की भूमिका संदिग्ध है तथा ग्राम पंचायत पनोतिया की सरपंच रेखा देवी और सचिव को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
गांव में इस मुद्दे को लेकर दो धड़े बन गए हैं। एक पक्ष इसे सामुदायिक भूमि बचाने की लड़ाई बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष कहता है कि उन्हें पंचायत द्वारा विधिवत दस्तावेज देकर बसाया गया और वे वर्षों से वहां रह रहे हैं। ऐसे में प्रशासन के सामने कानूनी और मानवीय दोनों पहलुओं को संतुलित करने की चुनौती है।
अब सबकी निगाहें उपखण्ड अधिकारी रेलमगरा की रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि जांच में अनियमितता प्रमाणित होती है तो सरपंच, सचिव और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई, पट्टों के निरस्तीकरण और अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यह प्रकरण तय करेगा कि राजसमन्द में सामुदायिक भूमि की सुरक्षा को लेकर प्रशासन कितना सख्त रुख अपनाता है और क्या दस वर्षों से चली आ रही फाइलों की परतें पूरी तरह खुल पाएंगी।


