परिवार का आरोप: “पत्नी रीता, साले–सालियों ने मिलकर की हत्या… पुलिस लापरवाही की सभी हदें पार”**
मुजफ्फरपुर/वैशाली | विशेष रिपोर्ट
दुर्गा नवमी की रात मुजफ्फरपुर के मनिका गांव में एक ऐसी घटना ने पूरे परिवार की खुशियों को पल भर में मातम में बदल दिया, जिसे सुनकर किसी के भी रौंगटे खड़े हो जाएं। 28 वर्षीय राकेश कुमार, जो पेशे से कैमरामैन थे, अपनी पत्नी रीता कुमारी को मनाने के लिए वैशाली से मनिका गांव स्थित ससुराल गए थे। उन्हें उम्मीद थी कि त्योहार के दिनों में घर की कड़वाहट मिट जाएगी, रिश्ते फिर से पहले की तरह जुड़ जाएंगे। लेकिन वह वापस लौटे… तो सिर्फ एक ठंडे शव के रूप में।
राकेश के पिता रंजीत राम बताते हैं कि पिछले कुछ समय से पति-पत्नी के बीच मनमुटाव बढ़ गया था। रीता कुमारी नाराज होकर बच्चों को ससुराल में ही छोड़कर मायके चली गई थीं। राकेश, जो भावुक स्वभाव के थे, दुर्गा दशमी की रात करीब 10 बजे पत्नी को मनाने निकल पड़े। लेकिन परिवार को क्या पता था कि यह उनका अपने बेटे को आखिरी बार जिंदा देखना होगा। परिवार ने बताया कि बच्चों को ससुराल में ही छोड़ दिया गया था और राकेश सीधे रीता को लेने मनिका पहुँचे थे।
इसी बीच छोटा भाई मुकेश रोते हुए कहता है—“भैया के पास पैसे नहीं थे… मैंने ही ₹300 दिए थे कि भैया, मेला घूम लेना… जरूरत पड़े तो और ले लेना।” मुकेश की आवाज टूट जाती है क्योंकि यह बातचीत उसके भाई से आखिरी मुलाकात बनकर रह गई। 4 अक्टूबर की सुबह मुसहरी थाना का फोन आया—“राकेश कुमार का शव सड़क किनारे मिला है।” सुनते ही परिवार की दुनिया जैसे थम गई।
शाम की तेज बारिश और रात के अंधेरे के कारण परिवार 5 अक्टूबर की सुबह SKMCH पहुंचा, जहां राकेश का पोस्टमार्टम हुआ। वहां जो बातें सामने आईं, उसने परिवार को झकझोर दिया। परिजनों का आरोप है कि यह साधारण मौत नहीं, बल्कि सोची-समझी हत्या है। परिवार का साफ आरोप है कि इस हत्या में पत्नी रीता कुमारी, साली बबीता कुमारी, साला छोटू कुमार और उसके पिता रमेश राम समेत कई लोग शामिल हैं। सभी मनिका, थाना मुसहरी के रहने वाले हैं। परिवार कहता है—“सारी घटना ससुराल में ही हुई… और शव सड़क पर फेंक दिया गया।”
परिवार का दर्द सिर्फ यहीं खत्म नहीं होता। रंजीत राम और मुकेश बताते हैं कि उन्होंने थाने से लेकर जिला स्तर तक दर्जनों आवेदन दिए, लेकिन सुनवाई कहीं नहीं हो रही। मुकेश का आरोप है कि पुलिस कॉल डिटेल, लोकेशन ट्रैकिंग, बयान दर्ज—कुछ भी नहीं कर रही। “ऐसा लगता है जैसे मामला दबाया जा रहा है… अगर पुलिस समय रहते सच सामने नहीं लाई तो आगे हम पर या बच्चों पर भी खतरा हो सकता है,”—मुकेश की आवाज डर और गुस्से से कांप उठती है।
परिवार की सबसे बड़ी पीड़ा उन दो मासूम बच्चों की है—सत्यम (9 वर्ष) और आदर्श (6 वर्ष)। दोनों रोज पूछते हैं—“पापा कहाँ हैं?” और यह सवाल परिवार के सीने में तीर की तरह चुभ जाता है। बच्चे अपनी उम्र से कई गुना बड़ा दर्द झेल रहे हैं—बिना पिता का भविष्य, और मां मायके में—उनके सामने बड़ा अंधेरा खड़ा है। परिवार फूट-फूटकर रोता है—“बच्चों का क्या होगा… उनका भविष्य कौन संभालेगा… कौन उनके सिर पर हाथ रखेगा?”
रंजीत राम ने टूटे स्वर में कहा—“मेरा बेटा घर की रीढ़ था… अब दो छोटे-छोटे बच्चे दर-दर पूछ रहे हैं—पिताजी कहां हैं? हमारी पूरी दुनिया उजड़ गई है।” मुकेश का दर्द भी कम नहीं—“मुझे बस इतना चाहिए कि मेरे भैया के कातिल का नाम सामने आए… चाहे वह कोई भी हो। हमें बस न्याय चाहिए।”
परिजनों ने मीडिया के माध्यम से अपील की है कि मामले की हाई-लेवल जांच हो, कॉल डिटेल निकाली जाए, पत्नी और ससुराल पक्ष की पूरी भूमिका की जांच हो, दोषियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए और बच्चों को न्याय दिलाया जाए। परिवार का दर्द साफ है—उन्होंने अपना बेटा खोया है, लेकिन न्याय पाने की उम्मीद अब भी बाकी है।
“हम टूट गए हैं… लेकिन न्याय नहीं छोड़ेंगे।”


