जोधपुर/सामराउ (राजस्थान)।
भारतीय सनातन परंपरा में गुरु की तन-मन से सेवा करने वाले शिष्य को जीवन भर संरक्षण और सम्मान का अधिकारी माना जाता है, लेकिन जोधपुर जिले के सामराऊ स्थित लाल गिरी जी के चोला आश्रम से सामने आया मामला इस मान्यता को झकझोर देने वाला है। दृष्टिहीन और हाथ-पैर से दिव्यांग संतोष गिरी के साथ कथित रूप से ऐसा अन्याय हुआ, जिसे लेकर साधु-संत समाज से लेकर ग्रामीणों में भी आक्रोश है।
प्रार्थी संतोष गिरी, गुरु श्री दिगंबर भैरव गिरी जी महाराज (श्री पंचधासनाम जूना अखाड़ा) के शिष्य हैं। संतोष गिरी वर्ष 2012 में गुरु स्थान लाल गुरु जी के चोला, सामराऊ आए थे। आंखों से अंधे और शारीरिक रूप से विकलांग होने के बावजूद उन्होंने 15 वर्षों तक अपने गुरु की निस्वार्थ सेवा की। आश्रम में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए चाय बनाना, भोजन तैयार करना, रोटियां बनाना और दिन-रात गुरु की सेवा करना ही उनका जीवन बन गया था।
वर्ष 2016 के उज्जैन सिंहस्थ कुंभ में गुरु परंपरा के अनुसार संतोष गिरी का संस्कार हुआ। परंपरा के तहत उनके चाचा गुरु महंत श्री दौलत गिरी को सखी बनाया गया और गुरु महाराज ने संतोष गिरी को उनकी जिम्मेदारी में सौंपा, क्योंकि संतोष को दिखाने-समझाने का कार्य आवश्यक था। इसके बाद भी संतोष गिरी ने गुरु सेवा में कोई कमी नहीं आने दी।
साल 2025 के प्रयागराज महाकुंभ में गुरु श्री दिगंबर भैरव गिरी जी महाराज का शरीर पूर्ण हो गया। संतोष गिरी गुरु के पार्थिव शरीर के साथ प्रयागराज से उमराव पहुंचे। आरोप है कि उस दौरान दादा गुरु महंत अर्जुन गिरी, चाचा गुरु दौलत गिरी और साली गिरी सहित कई गुरु मूर्तियों के समक्ष यह कहा गया कि संतोष गिरी यहीं रहेगा, क्योंकि इसने सेवा की है और विकलांग होने के कारण इसकी जिम्मेदारी आश्रम की है।
इतना ही नहीं, वर्ष 2020 में बृहस्पति गिरी के हरिद्वार में हुए संस्कार के बाद स्वामी समाज के 42 गांवों में भी यह कहा गया कि संतोष गिरी को लाल गुरु जी के चोला में ही रहना है। तय हुआ कि बृहस्पति गिरी लाल गुरु जी की धोनी संभालेंगे और संतोष गिरी दोनों गुरु भाइयों के साथ रहेगा। लेकिन आरोप है कि बाद में गेवर जाखड़, लक्ष्मण जाखड़, लक्ष्मण साइन और तारपुरी स्वामी सहित उमराव गांव के कुछ तथाकथित लोगों ने आपसी सलाह कर संतोष गिरी को ‘खंडित’ बताकर आश्रम से बाहर कर दिया।
संतोष गिरी का कहना है कि वह 15 वर्षों तक उसी आश्रम में रहा, तब किसी को उसका विकलांग होना खंडित नहीं लगा। गुरु महाराज के शरीर पूर्ण होते ही उसे खंडित कहकर बाहर निकाल दिया गया। यह न सिर्फ गुरु परंपरा का अपमान है, बल्कि एक दिव्यांग के अधिकारों का खुला हनन भी है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुरु-सेवा करने वाले शिष्य का हक मारना गंभीर पाप माना जाता है। दिव्यांग व्यक्ति के साथ भेदभाव करना न केवल अमानवीय है, बल्कि समाज और धर्म—दोनों के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। सवाल यह है कि क्या साधु-संतों की धरती पर सेवा, समर्पण और मानवता से बड़ा कोई स्वार्थ हो सकता है? और क्या संतोष गिरी जैसे दिव्यांग सेवक को न्याय मिलेगा, या उसकी आस्था की कीमत उसे दर-दर की ठोकरों से चुकानी पड़ेगी?


