सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के छह साल के अध्ययन के मुताबिक ग्राउंड-लेवल ओजोन अब भारत के शहरों में साल भर रहने वाला एक गंभीर स्वास्थ्य और जलवायु संकट बन चुका है।
नई दिल्ली: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की एक नई स्टडी के नतीजे बेहद चौंकाने वाले हैं। इस स्टडी के मुताबिक देश के शहरों में ग्राउंड लेवल ओजोन प्रदूषण फैल रहा है। यह प्रदूषण काफी देर तक बना रहता है। इस स्टडी के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर इस प्रदूषण के सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यह प्रदूषण सेहत और फसलों के काफी नुकसानदेह है।
क्या है ओजोन, क्यों बन रहा काल?
CSE की एक नई स्टडी के मुताबिक, ज़मीन के पास की ओज़ोन (जो हवा को प्रदूषित करने वाला एक अदृश्य लेकिन बहुत खतरनाक तत्व है) भारत के शहरों में साल भर रहने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य और जलवायु से जुड़ी चुनौती के तौर पर तेज़ी से उभर रही है। छह साल तक 25 शहरों के डेटा आधारित स्टडी से यह पता चला कि ओज़ोन प्रदूषण अब सिर्फ़ गर्मियों में अचानक बढ़ने या कुछ उत्तरी शहरी केंद्रों तक ही सीमित नहीं है। इसके बजाय यह अलग-अलग इलाकों में फैल गया है और ज़मीन के अंदर बसे शहरों और तटीय शहरों, दोनों में ही इसके लंबे समय तक संपर्क में रहना आम बात हो गई है।
CSE की ओर से 2021 से 2026 तक की अवधि में किए गए अध्ययन में दिल्ली-एनसीआर को देश का सबसे बड़ा क्षेत्रीय ओज़ोन हॉटस्पॉट बताया गया है। यहां साल पर वायु गुणवत्ता (AQI) का स्तर ऊंचा रहता है। इसकी मुख्य वजह PM 2.5 और PM10 जैसे पार्टिकुलेट मैटर की ज़्यादा मात्रा है। स्टडी में यह भी पता चला कि चंडीगढ़, जयपुर, अहमदाबाद, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी इसके संपर्क में आने का स्तर चिंताजनक है। वहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि बढ़ता तापमान, तेज़ धूप और ओज़ोन बनाने वाली गैसों का बढ़ता उत्सर्जन वायु प्रदूषण के स्वरूप को बदल रहा है, जिससे एक ऐसा खतरा पैदा हो रहा है जो पार्टिकुलेट मैटर से कहीं ज़्यादा गंभीर है।
इंसानों के शरीर पर व्यापक प्रभाव
जानकारों का कहना है कि जमीन के पास की ओज़ोन इंसानी शरीर पर असर डालने वाले सबसे खतरनाक वायु प्रदूषकों में से एक है। इससे स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। बता दें कि वायुमंडल में ऊपर मौजूद सुरक्षात्मक ओज़ोन परत के उलट, ज़मीन के पास की ओज़ोन तब बनती है जब गाड़ियों, उद्योगों, घरेलू ईंधन और कचरा जलाने से निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड और वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड (VOCs) तेज़ धूप में आपस में प्रतिक्रिया करते हैं।
फेंफड़ों को नुकसान
CSE की स्टडी के मुताबिक ओज़ोन फेफड़ों के ऊतकों को नुकसान पहुंचाती है, सांस की नली में सूजन पैदा करती है, अस्थमा को बढ़ाती है और धूल और पराग (पॉलन) जैसे एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाती है। सांस लेने में दिक्कत हो सकती है और इमरजेंसी में अस्पताल जाना पड़ सकता है। वहीं लंबे समय तक संपर्क में रहने से हार्ट अटैक, स्ट्रोक, दिल की बीमारी से मौत और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) के गंभीर रूप लेने का खतरा बढ़ जाता है।
सेहत के लिए घातक
CSE की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और स्टडी की मुख्य लेखिका अनुमिता रॉय चौधरी ने कहा, “हमारा विश्लेषण बताता है कि ज़मीन के स्तर पर ओज़ोन का बढ़ना और लंबे समय तक इसके संपर्क में रहना भारत की स्थानीय, सर्दियों की पार्टिकुलेट समस्या को साल भर चलने वाले, सीमा-पार संकट में बदल रहा है।” उन्होंने कहा कि ओज़ोन न केवल लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि खेती को भी नुकसान पहुंचाती है और गर्मी को रोककर जलवायु परिवर्तन में योगदान देती है, जिससे एक फीडबैक लूप बनता है जो ओज़ोन बनने की प्रक्रिया को और तेज़ करता है।
विश्लेषण में क्या पता चला?
इस साल 1 मार्च से 10 मई के बीच विश्लेषण किए गए 25 शहरों में से 15 शहरों में आठ घंटे के संपर्क के लिए नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड से ज़्यादा औसत गर्मी का ओज़ोन स्तर दर्ज किया गया। चंडीगढ़ में गर्मी के मौसम में ओज़ोन का सबसे ज़्यादा औसत कंसंट्रेशन 173 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज किया गया, इसके बाद जयपुर में 120 माइक्रोग्राम और अहमदाबाद में 115 माइक्रोग्राम दर्ज किया गया। भोपाल में भी औसत 109 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर के साथ स्टैंडर्ड से ज़्यादा स्तर दर्ज किया गया।
दिल्ली-एमसीआर ओजोन हॉटस्पॉट
दिल्ली-NCR देश का सबसे लगातार ओज़ोन हॉटस्पॉट बनकर उभरा। इस क्षेत्र में 71 दिनों की स्टडी अवधि के दौरान हर दिन नेशनल आठ-घंटे के स्टैंडर्ड से ज़्यादा स्तर दर्ज किया गया। दिल्ली के भीतर, औसतन लगभग नौ मॉनिटरिंग स्टेशनों पर हर दिन नियमों का उल्लंघन दर्ज किया गया, जबकि ग्रेटर नोएडा, नोएडा और गाजियाबाद सहित NCR के कई इलाकों में लगातार ओज़ोन का बढ़ा हुआ स्तर देखा गया।
रिपोर्ट प्रदूषण के पैटर्न में एक बड़े भौगोलिक बदलाव की ओर भी इशारा करती है। जबकि ओज़ोन लंबे समय से उत्तरी भारत से जुड़ी रही है, अब दक्षिण और पश्चिम भारत के शहरों में भी चिंताजनक ट्रेंड देखे जा रहे हैं। मुंबई में लगभग साल भर ओज़ोन का असर देखा गया।चेन्नई में स्टडी किए गए सभी शहरों में सबसे ज़्यादा एपिसोडिक ओज़ोन कंसंट्रेशन दर्ज किया गया, जबकि बेंगलुरु में इसका भौगोलिक विस्तार और संपर्क की अवधि लंबी देखी गई।
लंबे समय तक बना रहता है संपर्क
स्टडी के सबसे महत्वपूर्ण नतीजों में से एक यह है कि ओज़ोन अब कुछ समय के लिए बढ़कर खत्म नहीं हो जाती। इसके बजाय, यह हर दिन बहुत लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे सेहत पर कुल बोझ बढ़ जाता है। भोपाल में सबसे ज़्यादा औसत दैनिक एक्सपोज़र दर्ज किया गया, जहाँ ओज़ोन का स्तर लगभग 17 घंटों तक सुरक्षित सीमा से ऊपर बना रहा। इसके बाद लखनऊ का नंबर रहा, जहां 16 घंटे से ज़्यादा समय तक एक्सपोज़र रहा, जबकि मुंबई और बेंगलुरु में भी रोज़ाना लगभग 16 घंटों तक ओज़ोन का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया।
रिसर्चर का कहना है कि सिर्फ़ उन दिनों की गिनती करना जब ओज़ोन का स्तर तय सीमा से ज़्यादा था, स्वास्थ्य जोखिमों की असल गंभीरता को नहीं दिखाता, क्योंकि लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से ज़हरीले तत्वों का असर ज्यादा बढ़ जाता है। एक और चिंता की बात यह है कि सूरज डूबने के बाद भी ओज़ोन का स्तर बना रहता है। आम तौर पर ओज़ोन को दिन के समय का प्रदूषक माना जाता है, लेकिन अब कई शहरों में रात भर इसका स्तर खतरनाक बना रहता है।
स्टडी के दौरान दिल्ली-एनसीआर में 46 रातें ऐसी रहीं जब ओज़ोन का स्तर तय सीमा से ज़्यादा था; इसके बाद बेंगलुरु, भोपाल, पटना और मुज़फ़्फ़रपुर का नंबर आता है। मुंबई में रात के समय ओज़ोन का स्तर बने रहने का पैटर्न और भी मज़बूत दिखा; यह घटनाक्रम वायुमंडलीय स्थितियों से जुड़ा है जो प्रदूषकों को ज़मीन के पास रोककर रखती हैं।
स्वास्थ्य और पर्यावरण पर असर को लेकर चेतावनी
स्वास्थ्य के अलावा, रिपोर्ट में पर्यावरण पर पड़ने वाले व्यापक असर के बारे में भी चेतावनी दी गई है। ओज़ोन प्रकाश-संश्लेषण (photosynthesis) में बाधा डालकर पौधों की बढ़त को रोकती है, जिससे फ़सल की पैदावार कम होती है और खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा पैदा होता है। CSE ने ऐसे बढ़ते सबूतों का ज़िक्र किया है जिनसे पता चलता है कि हवा में मौजूद ओज़ोन भारत में गेहूं की पैदावार को हर साल लगभग 14 से 15 प्रतिशत तक कम कर सकती है।
हिमालयी क्षेत्र को भी पहुंच सकता है नुकसान
क्षेत्रीय स्तर पर शहरी और औद्योगिक इलाकों में बनने वाली ओज़ोन हिमालयी क्षेत्र की ओर भी बढ़ सकती है, जिससे वहां तापमान बढ़ सकता है और ग्लेशियर तेज़ी से पिघल सकते हैं। नीति में तुरंत बदलाव की मांग करते हुए, CSE ने कहा कि ‘नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम’ के अगले चरण में सिर्फ़ ‘पार्टिकुलेट मैटर’ (हवा में मौजूद बारीक कणों) पर ध्यान देने के बजाय, कई तरह के प्रदूषकों से निपटने की व्यापक रणनीति अपनानी चाहिए।
समाधान के उपाय
संस्था ने सुझाव दिया है कि ट्रांसपोर्ट, इंडस्ट्री, घरेलू ईंधन और कचरा जलाने से निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड, वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड (VOCs) और दहन (combustion) से जुड़ी अन्य गैसों को एक साथ नियंत्रित किया जाए। साथ ही, क्षेत्रीय ‘एयरशेड’ (हवा के बहाव वाले क्षेत्र) के आधार पर प्रबंधन किया जाए, जो अलग-अलग शहरों के बजाय राज्य की सीमाओं के पार प्रदूषण की समस्या का समाधान


