Friday, May 15, 2026
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अंग्रेजी बबूल बना राष्ट्रीय खतरा? तीन साल से जारी शिकायत, वैज्ञानिक रिपोर्ट के बाद फिर उठे सवाल

जयपुर/भीलवाड़ा/देहरादून। राजस्थान से उठी एक शिकायत ने अब देशभर में बहस छेड़ दी है। अंग्रेजी बबूल यानी ‘प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा’ को लेकर एक शिकायतकर्ता ने गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि यह पेड़ भारत की देसी जैव विविधता को खत्म कर रहा है और इसके फैलाव से लोगों में दाद, खुजली, संक्रमण जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। मामला इतना बढ़ गया कि इसकी शिकायत केंद्र सरकार के लोक शिकायत पोर्टल DARPG तक पहुंच गई, जहां अपील पिछले तीन वर्षों से लंबित बताई जा रही है।

दरअसल, भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद से जुड़े अरीड फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, जोधपुर द्वारा जारी एक आधिकारिक पत्र में स्वीकार किया गया है कि ‘प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा’ एक आक्रामक प्रजाति बन चुकी है और यह देशी जैव विविधता के लिए खतरा साबित हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक यह पौधा मूल रूप से मध्य और दक्षिण अमेरिका का निवासी है, जिसे वर्ष 1885-86 में कच्छ क्षेत्र में लाया गया था। बाद में राजस्थान के पश्चिमी इलाकों में इसका बड़े पैमाने पर रोपण किया गया और वर्ष 1940 में इसे “राजकीय वृक्ष” तक घोषित कर दिया गया था।

हालांकि संस्थान ने यह भी स्पष्ट किया कि इस पेड़ से मानसिक रोग, हार्ट अटैक या संक्रमण फैलने जैसी किसी वैज्ञानिक पुष्टि वाली रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है। रिपोर्ट में यह जरूर माना गया कि इसके कांटों से चरने वाले पशुओं में चोट और अंधेपन की आशंका हो सकती है। बावजूद इसके शिकायतकर्ता का दावा है कि इस पेड़ की पत्तियां जब तालाबों और नदियों में गिरती हैं तो पानी दूषित होता है और उससे त्वचा रोग तेजी से फैलते हैं।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि पिछले कई वर्षों में देश के अस्पतालों में दाद, खाज और खुजली की दवाइयों की बिक्री में भारी बढ़ोतरी हुई है और इसकी गंभीर जांच होनी चाहिए। उनका कहना है कि अंग्रेजी बबूल अब इतनी तेजी से फैल चुका है कि यह दूसरे पेड़ों और वनस्पतियों को खत्म कर रहा है। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके पूर्वजों ने वर्षों पहले भी इस पेड़ की जांच की मांग उठाई थी, लेकिन अंग्रेजी शासन और बाद की व्यवस्थाओं में इसे नजरअंदाज कर दिया गया।

भीलवाड़ा वन विभाग की रिपोर्ट में कहा गया है कि अंग्रेजी बबूल केवल वन भूमि पर ही नहीं बल्कि चारागाह, कृषि और अन्य सरकारी व निजी जमीनों पर भी फैला हुआ है, इसलिए वन विभाग अकेले इस पर कार्रवाई नहीं कर सकता। विभाग ने यह भी बताया कि बजट और सरकारी स्वीकृति मिलने पर समय-समय पर इसके उन्मूलन की कार्रवाई की जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा’ जैसी आक्रामक प्रजातियां पर्यावरण संतुलन के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं। यह पेड़ कम पानी में तेजी से बढ़ता है और आसपास की अन्य वनस्पतियों को पनपने नहीं देता। कई राज्यों में इसे हटाने को लेकर अभियान भी चलाए जा चुके हैं।

अब यह मामला केवल एक पेड़ तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पर्यावरण, जनस्वास्थ्य और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। शिकायतकर्ता ने केंद्र और राज्य सरकार से इस प्रजाति की व्यापक वैज्ञानिक जांच, सर्वे और नियंत्रण अभियान चलाने की मांग की है।

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